April 21, 2015

Mere Yaar Julahe



Hi,

This article is no where relevent to information Developers. It is just my another side. Poem from my heart and inspired by Gulzarji.

Bas u hi!!!



मेरे यार जुलाहे ने बुनी एक चादर
नरम,करीने से,एक गाठ भी न थी,
थी न कोई ससलवटे
बेदाग़, थी खुशरंग, मखमली थी वो चादर......
ले आया मैंने अपना समझ कर
ननरह था मै, गुस्ताख़ था
हर तार टूट गई ,
जुड़ा तो गाठें उभर आई...
बेरंग है अब ये रेशमी चादर
खुआब था वो, खुआब ही होगा
अब न तो टूटे हुए रेशम के धागे ही है,न ही है कोई मखमली एह्साश
न ही मुझे याद रहा कभी मेरा यार था
कोई जुलाहा
खुआब था वो खुआब ही होगा

-Rahul Karn

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